औरंगजेब की कब्र को हटाने की माँग और अबू असीम के बयान को लेकर हाल ही में जो माहौल बना, वह इस बात का प्रमाण है कि भारत में इतिहास को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या आज के भारतीय मुसलमानों को इस बहस में पड़ना चाहिए? क्या 17वीं सदी के किसी शासक के फैसलों और नीतियों के लिए 21वीं सदी के मुसलमानों को सफाई देने की जरूरत है? बिल्कुल नहीं!

 

इतिहास के पन्नों में झांकें तो साफ नजर आता है कि औरंगजेब सिर्फ मुसलमानों का प्रतिनिधि नहीं था। उसकी नानी एक राजपूत रानी थीं, उसकी दादी राजपूत वंश की थीं, और उसकी माँ का भी हिंदू राजवंशों से रिश्ता था। राजपूतों और मुगलों के बीच वैवाहिक संबंध सदियों तक रहे, जिससे दोनों का खून आपस में घुल-मिल गया। अकबर ने आमेर के राजा भारमल की बेटी से विवाह किया, जहाँगीर ने मेवाड़, जोधपुर और आमेर के राजपूतों से शादी की, और शाहजहाँ भी राजपूत रानी का बेटा था। औरंगजेब के शासनकाल में भले ही हिंदू-मुस्लिम तनाव की घटनाएँ हुईं, लेकिन यह समझना जरूरी है कि उस दौर में सत्ता संघर्ष में धर्म नहीं, बल्कि ताकत और राजनीति का खेल चला करता था।

 

राजाओं के लिए क्रूरता वीरता का पैमाना थी। सत्ता बचाने के लिए भाई को मारना, बगावत को कुचलना और विरोधियों को खत्म करना आम बात थी। यह सिर्फ औरंगजेब ने नहीं किया, बल्कि राजपूत, मराठा, सिख, अफगान और दूसरे शासक भी यही कर रहे थे। लेकिन आज जब देश लोकतंत्र और संविधान के तहत चलता है, तो उस समय की क्रूरता को आज के समाज पर थोपना बेवकूफी होगी।

 

अब सवाल उठता है कि क्या भारतीय मुसलमानों का औरंगजेब से कोई लेना-देना है? नाम और खून से इतिहास का रिश्ता नहीं बनता। अगर किसी का नाम औरंगजेब है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह मुगल शाही विरासत का वारिस है। भारत के अधिकतर मुसलमान मुगलों के वंशज नहीं हैं, बल्कि वे इस उपमहाद्वीप के मूल निवासी हैं, जो समय के साथ इस्लाम में आए। अगर राजपूतों से मुगलों की गहरी रिश्तेदारी थी, तो क्या आज के राजपूतों को भी औरंगजेब का समर्थक मान लिया जाए? इतिहास को जबरन आज पर थोपना एक खतरनाक मानसिकता है, जो समाज को सिर्फ नफरत की ओर धकेलेगी।

 

दंगों और फसादों से किसी को फायदा नहीं होता, नुकसान सिर्फ देश का होता है। भारतीय मुसलमानों का औरंगजेब की नीतियों से कोई संबंध नहीं है। वे लोकतंत्र और संविधान में विश्वास रखते हैं, और उन्हें जबरदस्ती मुगलकाल की राजनीति में घसीटना ऐतिहासिक अन्याय है। इतिहास को पढ़ा जाए, उससे सबक लिया जाए, लेकिन उसे हथियार बनाकर लोगों के बीच जहर घोलना बंद किया जाए। भारत की ताकत इसकी गंगा-जमुनी तहजीब में है, जिसमें हिंदू और मुसलमान मिलकर देश को आगे बढ़ाते हैं, न कि इतिहास के नाम पर बंटते हैं। औरंगजेब का दौर खत्म हो चुका है, अब 21वीं सदी में जीने का व

क्त है।

 

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