जब मीडिया जनता की आवाज़ बनने के बजाय सत्ता की चापलूसी और निरर्थक बहसों में उलझ जाए, तो नेपाल और सूडान जैसे देशों से भी नीचे आना कोई हैरानी की बात नहीं।
हर साल 3 मई को दुनियाभर में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। इसी मौके पर रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स (Reporters Without Borders) की ओर से विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (World Press Freedom Index) जारी किया जाता है। 2025 की रिपोर्ट के अनुसार भारत 180 देशों में 151वें स्थान पर है। यह सूचकांक 2002 से जारी हो रहा है।
हैरानी की बात है कि भारत अपने कई पड़ोसी देशों — जैसे नेपाल (90वां), मालदीव (104वां), श्रीलंका (139वां), और बांग्लादेश (149वां) — से भी नीचे है। हालांकि भारत की स्थिति भूटान (152वां), पाकिस्तान (158वां), म्यांमार (169वां), अफगानिस्तान (175वां), और चीन (178वां) से बेहतर है, लेकिन गिरावट का यह सिलसिला चिंता का विषय है।
मीडिया का बदलता चेहरा
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय मीडिया पर राजनीतिक दबाव, आर्थिक निर्भरता और संपादकीय स्वतंत्रता की कमी साफ दिखाई दे रही है। कुछ टीवी चैनल और डिजिटल पोर्टल्स ने अपनी संपादकीय स्वतंत्रता को त्याग कर एकतरफा नैरेटिव को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है। यही वजह है कि “नीतिपरक मीडिया” जैसे शब्द आम हो गए हैं — जो उनके रिपोर्टिंग के तरीके की एक सभ्य आलोचना है।
यह प्रवृत्ति पहलगाम हमले जैसे मामलों में खास तौर से दिखती है, जहां मीडिया का एक वर्ग सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के प्रवक्ता जैसा व्यवहार करता है, बजाय इसके कि वह जनता को निष्पक्ष जानकारी दे। स्थिति इतनी बिगड़ी कि सरकार को खुद एक एडवाइजरी जारी करनी पड़ी कि मीडिया अपनी सीमा में रहे।
बहस के नाम पर सनसनी और बंटवारा
कुछ टीवी एंकरों ने ऐसी बहसों को बढ़ावा दिया है जिनमें जनहित के मुद्दों की जगह विभाजनकारी, उत्तेजक और तनाव पैदा करने वाले विषयों को तरजीह दी जाती है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत ढांचे जैसे मुद्दों को पीछे छोड़ कर धार्मिक विवाद, सीमाई तनाव या अल्पसंख्यकों के खिलाफ भावनात्मक उकसावे को प्राथमिकता दी जाती है। यह रवैया न केवल पत्रकारिता की साख को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि सामाजिक सौहार्द के लिए भी खतरा है।
वैश्विक संस्थाओं की चेतावनी
रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स के अनुसार, “भारत में मीडिया की बहुलता खतरे में है, क्योंकि मीडिया का स्वामित्व कुछ ताकतवर राजनीतिक और कॉरपोरेट घरानों तक सिमट गया है।”
यह सूचकांक पांच मानदंडों पर देशों का मूल्यांकन करता है: राजनीतिक, कानूनी, सामाजिक, आर्थिक और सुरक्षा से संबंधित। रिपोर्ट की संपादकीय निदेशक एन बेकेंडे ने कहा, “आर्थिक स्वतंत्रता के बिना स्वतंत्र मीडिया संभव नहीं है।” जब संस्थाएं वित्तीय संकट में होती हैं, तो वे गंभीर पत्रकारिता के बजाय सनसनीखेज रिपोर्टिंग की ओर झुक जाती हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से भारतीय मीडिया एक “अघोषित आपातकाल” जैसी स्थिति में है। सरकार से निकटता रखने वाले बड़े मीडिया समूहों ने स्वतंत्र मीडिया को और कमजोर किया है।
मीडिया की असली जिम्मेदारी
मीडिया का काम सरकार का प्रवक्ता बनना नहीं, बल्कि जनसमस्याओं को उजागर करना, सवाल पूछना और लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देना है। जब पत्रकारिता अपने असल मिशन से भटक कर सिर्फ शक्तिशाली लोगों की आवाज़ बन जाती है, तो उसकी साख, प्रभाव और विश्वास को नुकसान पहुंचना तय है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रैंकिंग गिरना कोई आश्चर्य की बात नहीं।
अब भी कुछ पत्रकार और संस्थान ऐसे हैं जो ईमानदारी, संतुलन और शोध पर आधारित रिपोर्टिंग के सिद्धांतों को निभा रहे हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि ऐसे लोगों और संस्थाओं को समर्थन और प्रोत्साहन मिले।
(लेखक ‘इनक़लाब’, दिल्ली के रेज़िडेंट एडिटर हैं)
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