राजा चाहे किसी भी धर्म का हो, अगर वो चुनाव से नहीं, बल्कि आक्रमण, नामांकन या ताकत के ज़रिए सत्ता पर काबिज़ हुआ है, तो वो किसी भी हाल में लोकतंत्र नहीं है — वो सिर्फ़ ज़ुल्म की एक कहानी होती है। चाहे वो प्रजा की भलाई ही कर रखे, फिर भी ऐसी हुकूमत ग़ुलामी के सिवा कुछ नहीं होती। ऐसी सत्ता में “क्रूरता ही वीरता” है, और ताकत ही उसका इन्साफ़। अगर नहीं मारेगा, तो मारा जाएगा — यही उसका उसूल होता है। इसलिए जब भी कोई वर्तमान सरकार — पक्ष, विपक्ष, प्रतिपक्ष या कोई भी दल — अगर वो जनता के असली मुद्दों से ध्यान हटाकर इतिहास में उलझाकर आपके भावनाओं की राजनीति कर रही है, तो समझ लीजिए कि आपके हक़ और हक़ीक़त को दबाने की साज़िश हो रही है। याद रखिए, आपकी लड़ाई रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मान की है — न कि सैकड़ों वर्ष पहले के राजाओं महाराजाओं का विरोध या बचाव करने की।
